‘भगत के वश में हैं भगवान’

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ संचालक मोहन भागवत जी अपनी तीन दिवसीय यात्रा समाप्त कर भोपाल लौट चुके हैं। उनके प्रवास से संघ कार्यकर्ताओं को क्या शिक्षा मिली और कितना लाभ हुआ इसका अंदाजा तो हम नहीं लगा सकते, हाँ परंतु संघ प्रमुख भागवत जी भूतभावन महाकालेश्वर के कोटि-कोटि श्रद्धालुओं को अनुपम उपहार जरुर दे गये हैं और वह उपहार है भोलेनाथ की भस्म आरती के आम लोगों के दर्शन की शुरुआत।

बीते कुछ वर्षों से महाकाल और उनके अनन्य भक्तों के बीच की दूरियां निरंतर बढ़ती जा रही है। नगरवासी जो वर्षों तक बेरोकटोक महाकाल के सुगम और सुलभ दर्शन कर लेते थे उनके लिये अब यह काम आसान नहीं रहा। अधिकारियों के लिये तो महाकाल मंदिर एक प्रयोगशाला बना हुआ है। विगत तीन-चार वर्षों में व्यवस्था में इतने अधिक परिवर्तन हुए हैं कि दर्शनार्थी अगली बार आता है तो उसे नये मार्ग और नयी व्यवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। हम इस बात से भी पूरी तरह से सहमत हैं कि नवाचार में कुछ परेशानियां तो आती ही हैं और प्रयोग से ही बेहतर परिणाम निकलने की संभावनाएं बलवती होती है।

प्रशासनिक अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों को हमारा विनम्र सुझाव है कि क्यों नहीं सब लोग बैठकर भविष्य के 100 वर्षों के लिये महाकाल मंदिर के विकास का ‘ब्लू प्रिंट’ तैयार करें। देश के अन्य मंदिर जैसे तिरुपति बालाजी हो, शिर्डी का सांई मंदिर या वैष्णो देवी मंदिर हो वहां की चाक चौबंद व्यवस्थाओं से क्यों नहीं सीखा जा सकता है। उपरोक्त तीनों मंदिरों में एक-एक श्रद्धालु का हिसाब रखा जाता है। तिरुपति बालाजी मंदिर में तो दर्शनार्थी किस गेट से कितने बजे की अवधि में प्रवेश करेगा यह तक तय रहता है। गरीब से लेकर करोड़पति श्रद्धालु की सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है।

हमारे यहां मंदिर विकास पर करोड़ों खर्च करने के बाद भी हम आज तक यह निश्चित आँकड़ा नहीं बता सकते हैं कि सोमवार को, शिवरात्रि को या अन्य दिनों में कितने लोगों ने महाकाल के दर्शन किये हैं? कारण है कि हमारे यहाँ इस तरह की आधुनिक तकनीकी का उपयोग ही नहीं हुआ है। इस उज्जयिनी का दुर्भाग्य है कि यहां जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों का तालमेल नहीं हो पाता। मंदिर परिसर विकास की जब योजना बन रही थी तक ही सत्ता पक्ष और उससे जुड़े संगठनों को अधिकारियों के साथ बैठकर ही योजना को अंतिम रूप देना था, सारी माथापच्ची और किसके हित प्रभावित हो रहे हैं किसके नहीं यह सब योजना बनाने समय ही सोचना चाहिये था।

योजना को आकार देते समय या तो जनप्रतिनिधियों ने सहभागिता की जरुरत नहीं समझी या फिर ठीक ढंग से मंथन नहीं किया। न्यायालय आदेश के परिपालन में इतना कार्य होने के बाद योजना का विरोध करना समझ से परे हैं इसे शहर के विकास पर लगा ग्रहण ही माना जा सकता है। सत्ता पक्ष के संगठनों द्वारा ही विरोध करना इस महत्वपूर्ण कार्य में लगे अधिकारियों का मनोबल ही तोड़ेगा।
अधिकारियों को तो इस शहर में रहना नहीं है जो भी नुकसान या लाभ होना है वह शहर का ही होगा।

खैर जो हित-अहित होना था वह हो चुका पर एक बात का ध्यान मंदिर या परिसर के विकास के समय जरुर रखा जाना चाहिये कि भगवान भक्त से दूर ना हो बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को बाबा के दर्शन आसानी से होना चाहिये और उज्जैन के जो नागरिक वर्षों से नियमित दर्शनार्थी है उनको परेशानी नहीं होना चाहिये।

हम संघ प्रमुख भागवत जी को नमन करते हैं क्योंकि उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि वह महाकाल के सच्चे भक्त है क्योंकि, उनके आने पर ही भस्मार्ती शुरु हो सकी है। कहते हैं ना ‘भगत के वश में हैं भगवान’ यह सिद्ध हो गया है।

– अर्जुन सिंह चंदेल

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