अर्जुन के बाणः 32 वर्षों का काँग्रेसी वनवास जारी रहने की संभावना

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और सरदार पटेल की कर्मभूमि रहे गुजरात का इतिहास पाषाण युग की बस्तियों के साथ शुरू होता है। भूतकाल में इसे गुर्जर प्रदेश के नाम से जाना जाता था। छठीं शताब्दी से लेकर 12वीं सदी तक यहाँ गुर्जर राजाओं का राज रहा है इस कारण इसका नाम गुर्जर प्रदेश पड़ा जो बाद में गुर्जरत्रा के नाम से जाना जाने लगा और समय से साथ अपभं्रश होता हुआ ‘गुजरात’ हो गया। भारत की सबसे लंबी 1600 किलोमीटर तटरेखा गुजरात के पास है, लगभग 6.2 करोड़ (2013 का आंकड़ा) आबादी के साथ यह देश का नौवा और 1 लाख 96 हजार 24 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला यह देश का पाँचवा सबसे बड़ा राज्य है।

हम 2021-2022 के आंकड़ों की बात करें तो भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय लगभग 93 हजार 973 रुपये है। आय के मामले में देश का गोवा राज्य सबसे शीर्ष पर है जहाँ प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 4 लाख, 22 हजार, 149 रुपये है। दिल्ली दूसरे स्थान पर है जहाँ प्रति व्यक्ति आय 3 लाख 28 हजार 985 रुपये है, इसके बाद सिक्किम, चंडीगढ़ और हरियाणा आता है। गुजरात तो देश में 14वें स्थान पर है, जहाँ प्रति व्यक्ति 1 लाख 41 हजार 405 रुपये वार्षिक आय है। देश की आजादी के समय गुजरात राज्य का कहीं नामों निशान नहीं था, सन् 1960 में बम्बई राज्य की कोख से गुजरात राज्य का जन्म हुआ। देश की सर्वाधिक लम्बी समुद्री तट रेखा होने के फलस्वरूप गुजरात का कोई भी शहर ऐसा नहीं है जो समुद्र तट से 160 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर हो।

4.5 करोड़ से अधिक गुजरात के मतदाता दो चरणों में मतदान करेंगे। प्रथम चरण का मतदान 1 दिसंबर को होगा जिसमें 89 विधानसभा सीटों के लिये वोट डाले जायेंगे, वहीं 5 दिसंबर को दूसरे चरण में 93 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। गुजरात के 33 जिलों की 182 विधानसभा सीटों के परिणाम 8 दिसंबर को घोषित किये जायेंगे।

आइये जानते हैं गुजरात का राजनैतिक इतिहास

राज्य बनने के बाद सन् 1960 में गुजरात में 132 विधानसभा सीटों के लिये पहली बार चुनाव हुए जिसमें काँग्रेस ने प्रचंड विजय हांसिल करते हुए 112 सीटों पर विजय श्री प्राप्त की और प्रथम मुख्यमंत्री पद का दायित्व राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के चिकित्सक रह चुके जीवराम नारायण मेहता ने संभाला। सन. 1960 से 1975 तक गुजरात पर काँग्रेस का एकछत्र राज रहा। इस बीच पंचायती राज के वास्तुकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बलवंत राय मेहता भी सन् 1963 से 65 तक मृत्युपर्यन्त मुख्यमंत्री रहे। श्री मेहता का निधन पाकिस्तान द्वारा किये गये हमले के दौरान हो गया था। उसके बाद हितेन्द्र देसाई, घनश्याम ओझा, चिमनभाई पटेल ने गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान संभाली।

सन् 1975 में आपातकाल लगा, उसके पश्चात सन् 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में पहली बार राज्य में लोकदल, समता पार्टी और जनता दल ने मिलकर सरकार बनायी जो मात्र 211 दिन चलकर धराशायी हो गयी। सन् 1980 में हुए चुनाव में माधवसिंह सोलंकी काँग्रेस के कद्दावर नेता बनकर उभरे और उन्होंने गुजरात की राजनीति को एक नयी दिशा दी KHAM (K=क्षत्रिय, H=हरिजन, A=आदिवासी, M=मुस्लिम) को श्री सोलंकी ने एक किया और ‘खाम’ थ्योरी बनायी जिसने सन् 1985 के हुए विधानसभा चुनावों में काँग्रेस की जीत का एक नया इतिहास रच दिया। 182 में से 149 सीटों पर काँग्रेस ने प्रचंड जीत दर्ज की जिसे आज तक कोई भी राजनैतिक दल छू भी नहीं सका है।

सन् 1990 में माधवसिंह सोलंकी केKHAM के विरुद्ध भाजपा ने पटेल समुदाय को अपना हथियार बनाया। जनता दल के नेता चिमनभाई पटेल और भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व केशुभाई पटेल ने किया। दोनों मिलकर लड़े और काँग्रेस को पराजित किया। केशुभाई पटेल को गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान सौंपी गयी।
सन् 1985 में पटेलों की बदौलत भाजपा ने 182 सीटों में से 121 पर कब्जा जमा लिया। सन् 2001 में केशुभाई की क्षमता से निराश होकर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने श्री दामोदर नरेन्द्र मोदी को गुजरात के 22वें मुख्यमंत्री की कमान सौंपी जो 13 वर्षों तक गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहने के बाद देश के प्रधानमंत्री बने।

2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाये बैठी भारतीय जनता पार्टी 15वीं विधानसभा के लिये होने जा रहे मतदान में भी मजबूत स्थिति में दिखायी दे रही है। हाँ इतना जरूर है कि भाजपा को अपनी साख बचाने के लिये इस बार अधिक खून-पसीना बहाना पड़ रहा है। यदि भारतीय जनता पार्टी का बीते 32 वर्षों का शासन-प्रशासन अच्छा रहता तो शायद इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती।

गुजरात के मतदाताओं पर इस समय पूरे देश की तरह नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व का जादू सर चढक़र बोल रहा है। भाजपा के पास ना तो इस विधानसभा चुनावों में कोई मुद्दा है ना ही कोई नया वादा, सिर्फ और सिर्फ है तो नरेन्द्र मोदी जो इस समय पूरी भारतीय जनता पार्टी के लिये ‘खैवन हार’ की भूमिका निभा रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी से त्रस्त भारतीय मतदाता चाहकर भी दूसरे राजनैतिक दलों को मतदान नहीं कर रहा है क्योंकि विपक्ष पर उसे विश्वास और भरोसा नहीं रहा। फिर भी गुजरात से आ रहे चुनावी विश्लेषणों से यह आभास हो रहा है कि गुजरात में काँग्रेस की परम्परागत सीटों पर सेंध लगाने में भाजपा को बहुत अधिक सफलता नहीं मिली है।

काँग्रेस का प्रदर्शन भी सम्मानजनक रहने वाला है और वह राज्य में दूसरे स्थान पर कायम रहने में सफल रहेगी। आम आदमी पार्टी की उपस्थिति इस बार के चुनावों में स्पष्ट दिखायी दे रही है मीडिया चाहकर भी चुनावी रण में उसकी मौजूदगी को नकार नहीं पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि ‘आप’ पार्टी काँग्रेस के ही वोट बैंक का नुकसान करेगी, भारतीय जनता पार्टी शासन के कार्यकाल से असंतुष्ट मतदाता भी उसे मतदान करेंगे जिसके फलस्वरूप उसका गुजरात विधानसभा में प्रवेश निश्चित है, भले ही उसे दो अंकों में पहुँचने का भी मौका ना मिले पर वह तीसरे दल के रूप में गुजरात में आहट देने में सफल हो गयी है।

– अर्जुन सिंह चंदेल

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